समय के साथ बदलों वरना बदल दिए जाओगे

समय के साथ बदलों वरना बदल दिए जाओगे

ये पीले रंग की दुकानें याद है? STD-PCO-ISD की दुकानें अब इतिहास हो चुकी है। एक समय था जब घर मे फोन होने के बावजूद परदेस में रहने वाले दोस्त-रिश्तेदारों से बात करने का यही माध्यम हुआ करते थे। STD का कनेक्शन कम लोग ही लेते थे, घर से बात करनी हो तो ज्यादा से ज्यादा ट्रंक बुकिंग करवा लो वरना यही सहारा होते थे बातचीत का।

फिर हुई "संचार क्रांति"।
हर घर मे एक मोबाइल पहुंच गया। 6 रुपए प्रति मिनट से होते हुए 1 रुपए प्रति मिनट का दौर तो लगभग सभी को याद होगा ही। उस वक़्त तक मोबाइल में इंटरनेट के नाम पर एक GPRS हुआ करता था, जिसमें 5-50 KB डाऊनलोड करना भी बड़ा दुष्कर था। राजस्थान में उस समय BSNL के अलावा ओएसिस और एस्सार कम्पनियां हुआ करती थी।

2004 में धीरूभाई अंबानी की मृत्यु के बाद उनके छोटे पुत्र अनिल अंबानी ने R-COM की शुरुआत की और 500 रुपए में CDMA वाले फोन बांटने शुरू किए। इसमें "इंटरनेट" भी था जिसे केबल के माध्यम से PC में जोड़ "फ़ास्ट इंटरनेट" चलाया जाता था। एक जबरदस्त क्रांति हुई थी उस समय। लेकिन अनिल अंबानी का ये स्वर्णिम युग ज्यादा न टिका और कम्पनी को अपने कारोबार समेटने पड़े। CDMA की तकनीक पर ही आगे बढ़ते हुए टाटा इंडिकॉम, वर्जिन मोबाइल जैसी कई कम्पनियां आई। कुछ समय बाद ये कम्पनियां भी बड़ी कम्पनियों में मर्ज हो गयी।


इसी दौर में धीरूभाई अंबानी के बड़े बेटे मुकेश अंबानी ने टेलीकॉम में पुनः अपनी छलांग लगाई। और मार्किट में आया "जिओ"। मुकेश इस बिजनेस में पहले ही उतरना चाहते थे लेकिन दोनों भाइयों के बीच हुए करार के बाद वे एक दूसरे की फील्ड में बिजनस नहीं कर सकते थे। जिसे बाद में दोनों ने सहमति से हटाया। जिओ ने आते ही बाकी टेलीकॉम कंपनियों में हड़कंप मचाया। कई कम्पनियों को आपसी करार करने पड़े और 300 में 1 महीने की वेलिडिटी वाला 1 GB कब 300 रुपए में 3 महीने और 1 GB प्रतिदिन में बदला पता नहीं चला।

ये सब कहानी बांचने का कारण इस फोटो को देख समझ आ जाएगा-
ये फोटो है अमेज़ॉन-फ्लिपकार्ट-स्नैपडील जैसी कम्पनियों द्वारा उस दौर में 19 हज़ार करोड़ की सेल का जब एक बड़ा वर्ग "भयंकर मंदी" का रोना रो रहा हो। 


ये ऑनलाइन शॉपिंग कम्पनियां आज हर मोबाइल में उपलब्ध है। हर घर पहुंच डिलीवरी देती है, पसंद न आने पर बिना कुछ पूछताछ माल वापस भी लेती है। बड़ी से बड़ी मैट्रोसिटी से लेकर छोटे से गांव और ढाणी में अपने प्रोडक्ट पहुंचा रही है ऊपर से डिस्काउंट के ऑफर भी दे रही है। और सबसे बड़ी बात की ये अपना माल "1 नम्बर" में with Bill दे रहे है। इसका बड़ा असर हमारे लोकल मार्केट में सामान बेचने वाले दुकानदारों पर पड़ रहा है। 

हमारे लोकल मार्किट वाले दुकानदार भी इन ऑनलाइन वालों को छकाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे। भर भर के इमोशनल मैसेज व्हाट्सएप-फेसबुक पर डाल रहे है। एक ऐसा ही मैसेज मुझे भी मिला-

इन इमोशनल मैसेजेज से कब तक काम चलेगा ये आज नहीं तो कल दुकानदार भाइयों को सोचना ही पड़ेगा। आज भी जब दुकान पर जाता हूँ तो वहां चिपका "बेचा हुआ माल वापस नहीं लिया जाएगा!" और "आज नकद कल उधार" वाला स्टिकर अनायास ही व्यक्ति को ऑनलाइन कम्पनियों द्वारा दी जा रही सुविधाएं याद दिलाता है। ऊपर से "पक्का बिल" न देने का जुनून दुकानदारों को अपनी USP लगता है। 

हम अपना व्यापार न चलने के लिए GST को कोस लेंगे लेकिन कस्टमर को पक्का बिल नहीं देंगे। हम "भयंकर मंदी" का रोना रो लेंगे लेकिन दुकान पर कार्ड या मोबाइल से पेमेंट देने का ऑप्शन अपने कस्टमर को नहीं देंगे। हम "ऑनलाइन खरीदारी न करें" वाला बैनर दुकान पर लगा लेंगे लेकिन भीम app के QR कोड वाला कागज़ दुकान पर नहीं लगाएंगे!

आज जब गोबर का कंडा लोग 100 रुपए में ऑनलाइन बेच रहे है क्या हमारे दुकानदार अपना माल ऑनलाइन नहीं बेच सकते?

क्यों न दुकानदार भाई अपने कस्टमर्स से सतत सम्पर्क बना उनकी जरूरतें पूंछे और उस अनुरूप आपूर्ति करें। समय है कि लोकल दुकानदार अपना "इमोशनल अत्याचार" चलाने की बजाए अपनी मांग क्रिएट करें.... और समय के साथ बदलें।।।
वरना STD-PCO, सायबर कैफे और नॉकिया, RCOM, TATA Indicom की तरह कब पब्लिक आपका रिप्लेसमेंट खोज लेगी ये आप भी न जान पाएंगे। 

सादर
✍️
निखिल व्यास



टिप्पणियाँ

Anurag Chaturvedi ने कहा…
आप का विश्लेषण अधूरा है ऑनलाइन का रोना रोने वाले खुद ऑनलाइन माल खरीद कर माल बेच रहे हैं । परिवर्तन करें कैसे जब showroom ओर ऑनलाइन मूल्य एक सा तो व्यक्ति offline माल ही खरीदेगा।
है जो माल ऑनलाइन ही मिलता उनकी बात अलग हैं ।