आज यानी 12 अक्टूबर को सूचना का अधिकार अर्थात ‘‘आरटीआई’’ का जन्मदिन है।
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता के प्रति जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करने एवं कार्य में पारदर्शिता लाने में सूचना का अधिकार अधिनियम का अहम योगदान रहा है। अधिनियम के आने के बाद इस अधिनियम की सहायता से न सिस्टम में पारदर्शिता आई है अपितु भ्रष्टाचार के कई मामले भी उजागर हुए है। इस अधिनियम से प्राप्त दस्तावेज साक्ष्य के रूप में न्यायालयों द्वारा भी ग्रहण किये जाते है जिनके चलते मुकदमों के पक्षकारों के लिये भी साक्ष्य जुटाना सरल हो चुका है।
अपने अस्तित्व में आने के बाद से एक कानून के रूप में यह अधिनियम काफी लोकप्रिय एवं कारगर साबित हो रहा है, जिसका कारण यह है कि आजादी के बाद यह पहला ऐसा कानून है जिसमें अधिकार अधिकारियों के पास न होकर आम जनता के पास आये है। जिस प्रकार एक विधायक एवं सांसद को विधानसभा एवं संसद में प्रश्न पुछने का अधिकार है एवं अधिकारियों को इन प्रश्नों का जवाब देना ही होता है। इसी तर्ज पर इस अधिकार के तहत आम जनता अपने जनप्रतिनिधियों की तरह अपनी समस्याओं से संबंधित प्रश्न कर समस्याओं का हल निकाल सकती है एवं अधिकारी इन प्रश्नों के जवाब देने के लिये बाध्य हुए। साथ ही लोक सूचना अधिकारी यदि समय पर सूचना उपलब्ध न कराता है तो उस पर 250/- रू प्रति दिन के हिसाब से दंड का प्रावधान है। यह दंड़ 25,000/-रू अधिकतम हो सकता है। साथ ही आवेदन लेने से मना करने, बगैर किसी वैध कारण सूचना देने में विलंब करने, जानबुझकर गलत या अधुरी एवं दिग्भ्रमित करने वाली सूचना देने, सूचना में मांगे गये दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ अथवा दस्तावेजों को समाप्त करने की स्थिति में धारा 7(1) के तहत राज्य एवं केन्द्रीय सूचना आयोग आर्थिक दंड के साथ साथ सूचना अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का भी अधिकार रखता है।
इतिहासः-
इस अधिनियम के अस्तित्व में आने की नींव उस समय पड़ी जब चुनाव में उम्मीदवारों के बारे में जानकारी प्राप्त करने के अधिकार को लेकर वर्ष 2002 में भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म केस में माननीय सर्वाच्च न्यायालय द्वारा जानने के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)अ के अन्तर्गत मौलिक अधिकार माना। वैसे तो अनुच्छेद 19(1)अ नागरिकां को बोलने एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित है लेकिन स्वतंत्र विचार अभियक्ति तभी संभव है जब व्यक्ति के पास विषयों की पूर्ण एवं युक्तियुक्त जानकारी हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के आलोप में तत्कालीन वाजपेयी सरकार वर्ष 2003 में Freedom of Information act- 2002 लेकर आई। इस अधिनियम के बाद सूचना प्राप्त करना जनता का अधिकार बन चुका था। इसमें कुछ और सुधारों के बाद 15 जून, 2005 को ‘‘सूचना का अधिकार-2005’’ अधिकार में आया एवं 120 वें दिन अर्थात 12 अक्टुबर, 2005 को ये संपूर्ण रूप से प्रभाव में आया। इसके कुछ प्रावधान तुरंत प्रभाव से 15 जून से ही लागु किये गये जिनमें सेक्शन 4(1) लोक प्राधिकारितों कि बाध्यताएं, 5(1) व (2) लोक सूचना अधिकारियों कि नियुक्ति, केन्द्रीय सूचना आयोग एवं राज्य सूचना आयोग का गठन (12,13,15,16), नियम 24 के तहत शास्तियां जिनमें लोक हित एवं राज्य हित में देश की एकता, अखंडता, सूरक्षा से संबंधित एवं अन्य गुप्त सूचनाए न देना एवं 27 के तहत समस्त शक्तियां सरकार को दिये जाने का प्रावधान तुरंत प्रभाव से लागु किये गये। इससे पूर्व जम्मु कश्मीर, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडू, असम एवं गोवा राज्यों द्वारा अपने राज्य अधिनियम पारित कर दिये थे। केन्द्र सरकार का यह अधिनियम जब पास हुआ तक जम्मु कश्मीर को छोड़ कर संपूर्ण देश पर लागु था जो अब संपूर्ण भारत में लागू है।
सूचना का अधिकार संसद ने जिस पवित्र उद्धेश्य के साथ पारित किया उस पावन उद्धेश्य से भिन्न कुछ लोगों अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के लिये इसका दुरूपयोग कर इस कानून को ‘‘ब्लैक मेलिंग’’ वाले कानून की श्रेणी में ला खडा किया है जिसके कारण वास्तविक जरूरतमंदों को भी परेशानी झेलनी पड़ती है लेकिन एक पक्ष यह भी है कि ‘‘ब्लैकमेलिंग’’ वहीं होती है जहां कुछ कमी हो। ऐसे में इस कानून की सार्थकता तभी पूर्ण होगी जब जनता एवं अधिकारी दोनों ईमानदारी से इस कानून के उद्धेश्यों के अनुरूप कार्य करें।
आवेदन का तरीकाः-
सूचना पाने के लिये सामान्य कागज पर अथवा इसके लिये निर्धारित प्रपत्र पर एवं लिख कर मांगने में समर्थ न होने पर मौखिक भी मांग सकते है। सूचना मौखिक मांगे जाने कि स्थिति में लोक सूचना अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह इसे लिपीबद्ध करें। यह सूचनाएं ‘सूचना का अधिकार-2005’ की धारा 6(1) के तहत 10 रूपये के शुल्क के साथ मांगी जानी चाहिये। यह शुल्क नकद, डी.डी, पोस्टल आर्डर, बैंकर्स चैक के साथ मांगी जा सकती है। अब सरकार ने सूचनाओं के आवेदन ऑनलाईन उपलब्ध कराने की भी सुविधाएं दे दी है। कुछ राज्यों में मनी आर्डर, कोर्ट स्टांप एवं निर्धारित खाते में सीधे जमा करवाकर राशि का भुगतान करने कि सुविधाएं भी दी गई है। सूचना देते समय कार्यालय आवेदनकर्ता से 2/- प्रति प्रतिलिपी लेगा। साथ ही दस्तावेजों के निरीक्षण किये जाने कि स्थिति में पहले घंटे कोई शुल्क नहीं एवं इसके पश्चात 5 रू प्रति घंटे लगेगा। यदि सूचना अधिकारी निर्धारित समय में सूचना उपलब्ध नहीं करा पाता है तो सभी सूचनाएं निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी। इसके साथ ही बीपीएल श्रेणी के व्यक्ति निःशुल्क सूचना प्राप्त कर सकते है।
सूचना का तात्पर्यः-
किसी भी प्रकार की सूचना यथा रिकोर्ड, दस्तावेज, रसीद, मीमो, ई-मेल, राय, सलाह, प्रेस रिलिज, सर्कुलर, आदेश, लोग बुक, संविदाएं, रिपोर्ट, कागजात, सेंपल, मॉडल, डाटा सामग्री आदि प्राप्त की जा सकती है।
सूचना के अधिकार का तात्पर्यः-
इस अधिकार के तहत सरकारी कार्या, रिकार्ड, दस्तावेज, रसीद, मीमो, ई-मेल, राय, सलाह, प्रेस रिलिज, सर्कुलर, आदेश, लोग बुक, संविदाएं, रिपोर्ट, कागजात, सेंपल, मॉडल, डाटा सामग्री आदि सभी जानकारियां प्रतिलिपी, प्रिंट आउट, सीडी, फ्लापी, टेप, वीडीयों कैसेट, आदि के जरिये ईलेक्ट्रोनिक माध्यम अथवा कागज पर प्राप्त किया जा सकता है।
सूचना देने के लिये निर्धारित समय सीमाः-
आवेदन के 30 दिनों के भीतर, किसी व्यक्ति के जीवन एवं स्वतंत्रता के लिये युक्तियुक्त कारण होने पर सूचनाएं 48 घंटों के भीतर भी प्राप्त की जा सकती है। तीसरे पक्ष के सम्मलित होने कि स्थिति में 40 दिनों का समय अधिकतम होगा। सूचना पाने के लिये किसी प्रकार का कारण बताये जाने कि आवश्यकता नहीं है। साथ ही पत्र व्यवहार के लिये आवश्यक नाम एवं पते एवं फोन नं. के अलावा अन्य जानकारी उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता नहीं है।
सूचना उपलब्ध न करा पाने की स्थिति में दंडः-
लोक सूचना अधिकारी यदि समय पर सूचना उपलब्ध न करा पाता है तो उस पर 250/- रू प्रति दिन के हिसाब से दंड का प्रावधान है। यह दंड़ 25,000/-रू अधिकतम हो सकता है। साथ ही आवेदन लेने से मना करने, बगैर किसी वैध कारण सूचना देने में विलंब करने, जानबूझकर गलत या अधुरी एवं दिग्भ्रमित करने वाली सूचना देने, सूचना में मांगे गये दस्तावेजों के साथ खिलवाड़ अथवा दस्तावेजों को समाप्त करने की स्थिति में राज्य एवं केन्द्रीय सूचना आयोग आर्थिक दंड के साथ-साथ सूचना देने वाले अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का भी अधिकार रखता है। यह आर्थिक दंड आवेदनकर्ता को नहीं मिलेगा अपितु सरकारी खाते में जमा होगा।
लोक सूचना अधिकारी के कर्तव्यः-
आवेदनकर्ता यदि आवेदन लिखित प्रस्तुत करने में असमर्थता जाहिर करता है तो लोक सूचना अधिकारी का यह दायित्व होगा कि वह आवेदनकर्ता के मौखिक आवेदन को स्वीकार कर उसे लिपीबद्ध करे। साथ ही नियम 6(3) के तहत सूचनाएं अपने कार्यालय से संबंधित न होने कि स्थिति में 5 दिनों के भीतर आवेदन संबंधित विभाग को भेजेगा। सूचना उपलब्ध कराने के लिये लोक सूचना अधिकारी अन्य अधिकारियों कि सहायता ले सकता है। आवेदन अस्वीकार किये जाने कि स्थिति में लोक सूचना अधिकारी को आवेदनकर्ता को इसकी जानकारी देते हुए अस्वीकार किये जाने का कारण, अस्वीकार किये जाने के खिलाफ कितने दिनां में आवेदन किया जाना चाहिये (अपील करने कि समय सीमा) एवं किसे आवेदन किया जाना चाहिये (अपीलेट अधिकारी का नाम एवं पदनाम) बताना पडेगा। सूचनाएं जिस क्रम में मांगी गई हो उसी क्रम में उपलब्ध कराई जाएगी। किसी तीसरे पक्ष के संबंध में सूचना होने कि स्थिति में लोक सूचना अधिकारी तीसरे पक्ष को लिखित सूचना के द्वारा 5 दिनां के भीतर अवगत करवाएगा। तृतीय पक्ष को यह सूचनाएं 10 दिनां के भीतर उपलब्ध करानी पडेगी। लोक सूचना अधिकारी नियम 8(1), 8(2), 8(3) के अन्तर्गत आने वाले 11 विषयों से संबंधित सूचना होने कि स्थिति में एवं देश कि प्रमुख 18 एजेंसीयों से संबंधित सूचनाएं उपलब्ध कराने से मना कर सकता है। लोक सूचना अधिकारी किसी भी सूरत में आवेदन लेने से मना नहीं कर सकता है, चाहे मांगी सूचना उसके विभाग से संबंधित न भी हो तब भी उसे सूचना के अधिकार 2005 के तहत आने वाले प्रत्येक आवेदन को स्वीकार करना ही पडेगा।
सूचना न मिलने पर अपील के प्रावधानः-
प्रथम अपीलः- निर्धारित अधिकतम समयावधि (30 दिवस) में सूचना प्राप्त न होने कि स्थिति में प्रथम अपील लोक सूचना अधिकारी से बडें पदाधिकारी को आवेदन के 31वें से 60वें दिन के भीतर करनी होगी। युक्तियुक्त कारण बताकर 60वें दिन के बाद आवेदन किया जा सकता है। प्रथम अपील का निर्णय अपीलेट अधिकारी को 30 दिन में करना होगा। आवश्यक कारण होने पर भी यह निर्णय 45 दिन के भीतर करना होगा। प्रथम अपील साधारण कागज पर अपीलेट अधिकारी के नाम एवं पते सहित एवं आवेदन पत्र कि प्रति संलग्न कर भेजा जा सकता है।
द्वितीय अपीलः- द्वितीय अपील राज्य अथवा केन्द्रीय सूचना आयोग को प्रथम अपील के निर्णय के 90 दिन के भीतर की जा सकती है। युक्तियुक्त कारण बताकर 90 दिन के बाद आवेदन किया जा सकता है। इसमें भेजे जाने वाले संलग्नक 2 प्रतियों में होने चाहिये।
प्रथम एवं द्वितीय अपील का कोई शुल्क नहीं देना होगा।
हाल में हुए बदलावः- वर्ष 2019 में सूचना के अधिकार में संसद द्वारा मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों के कार्यकाल एवं वेतन के संबंध में कुछ बदलाव अवश्य किये है लेकिन जनता के सूचना प्राप्त करने के अधिकारों में कोई बदलाव नहीं आया है।
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निखिल व्यास
अधिवक्ता
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